एमपी-एमएलए कोर्ट का फैसला: महामारी के दौरान जनता की आवाज उठाने पर दर्ज हुआ था केस; समर्थकों में जश्न
वाराणसी, 3 जून (त्रिपुरेश्वर त्रिपाठी ):
वाराणसी की विशेष एमपी-एमएलए (अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट चतुर्थ) अदालत ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए युवा कांग्रेस के प्रदेश महासचिव ओम शंकर शुक्ला को छह साल पुराने एक आपराधिक मामले में सभी आरोपों से ससम्मान बरी कर दिया है। यह मुकदमा वर्ष 2020 में कोरोना महामारी के दौरान कोतवाली थाने में दर्ज किया गया था। न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलें और साक्ष्य सुनने के बाद कांग्रेस नेता को पूर्णतः निर्दोष पाया।
क्या था पूरा मामला?
कोरोना काल के दौरान जब देश और वाराणसी की जनता स्वास्थ्य सुविधाओं, ऑक्सीजन की किल्लत और प्रशासनिक बदहाली से जूझ रही थी, तब कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने जनसमस्याओं को लेकर विरोध प्रदर्शन किया था। प्रशासन ने इस लोकतांत्रिक विरोध को दबाने के लिए तत्कालीन कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं पर मुकदमा दर्ज कर लिया था।
न्यायालय के इस फैसले के बाद अब पुलिस और तत्कालीन प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं कि क्या जनहित की आवाज उठाना अपराध था?
"मुकदमे हार गए, जनसंघर्ष जीत गया। सत्ता का दमन हारा और संविधान की आवाज जीती है। यह फैसला साबित करता है कि जनता की लड़ाई लड़ने वालों को झूठे मुकदमों से डराया नहीं जा सकता।"
— ओम शंकर शुक्ला, प्रदेश महासचिव, युवा कांग्रेस
वरिष्ठ वकीलों की टीम ने की पैरवी
अदालत में ओम शंकर शुक्ला के पक्ष में कानूनी लड़ाई वरिष्ठ अधिवक्ता वीरेंद्र मिश्रा, अधिवक्ता विवेक शंकर तिवारी और अधिवक्ता गौरव केशरी ने लड़ी। उन्होंने कोर्ट के सामने अकाट्य साक्ष्य और दलीलें पेश कीं, जिसके आगे अभियोजन पक्ष के आरोप टिक नहीं सके और माननीय न्यायालय ने केस को खारिज करते हुए नेता को दोषमुक्त कर दिया।
कांग्रेसियों और समर्थकों में उत्साह का माहौल
फैसले की खबर आते ही कचहरी परिसर से लेकर कांग्रेस कार्यालयों तक समर्थकों और युवाओं में भारी उत्साह देखा गया। मिठाई बांटकर और नारेबाजी कर खुशी का इजहार किया गया। स्थानीय कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह जीत केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि राजनीतिक द्वेष के खिलाफ लोकतांत्रिक अधिकारों और सच की जीत है। नेताओं ने साफ किया कि युवा आवाजों को दबाने की कोशिशें कभी कामयाब नहीं होंगी और जनता के हक की लड़ाई आगे भी जारी रहेगी।
