काशी की बेटी दृष्टि प्रद्धवानी ने रचा इतिहास: सीए फाइनल में स्वर्णिम सफलता, ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ का बनीं जीवंत उदाहरण

 डीपीएस वाराणसी से ICAI तक का सफर: सिंधी समाज की गौरव दृष्टि ने दिया ‘देश की बैलेंस शीट मजबूत करनी है’ का सदेश

विक्की मध्यानी

वाराणसी। इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया (ICAI), नई दिल्ली ने जब सीए फाइनल का परिणाम घोषित किया, तो काशी की माटी से एक ऐसी आवाज उठी जिसने पूरे देश को सुनाया —बेटियां बोझ नहीं, भविष्य हैं’। सिगरा स्थित आशियाना अपार्टमेंट, सिद्धगिरी बाग निवासी वरिष्ठ सीए जय प्रद्धवानी की 24 वर्षीय सुपुत्री दृष्टि प्रद्धवानी ने इस प्रतिष्ठित परीक्षा में शानदार कामयाबी हासिल कर न सिर्फ परिवार, बल्कि पूरे पूर्वांचल और सिंधी समाज को गौरवान्वित कर दिया।

तप से तपकर कुंदन बनीं दृष्टि*  

मुंबई के कॉरपोरेट जगत की आपाधापी से लेकर काशी की आध्यात्मिक शांति तक, दृष्टि ने अपनी आर्टिकलशिप का एक-एक दिन तपस्या की तरह जिया। त्योहारों की रौनक और रातों की नींद कुर्बान कर उन्होंने जो मुकाम हासिल किया, वह केवल एक डिग्री नहीं, आत्मनिर्भर भारत’ की नींव में एक मजबूत ईंट* है। पिता जय प्रद्धवानी की छत्रछाया में उन्होंने पारिवारिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए सिंधी समाज की बेटियों के लिए नई राह खोल दी।

डीपीएस की क्लास से राष्ट्रनिर्माण का संकल्प तक

डीपीएस वाराणसी की मेधावी छात्रा रहीं दृष्टि ने किताबों के पन्नों पर सिर्फ अंक ही नहीं, देशसेवा के स्वप्न भी उकेरे थे। आज सीए बनने के बाद उनकी आंखों में *एमबीए फाइनेंस* के जरिए वैश्विक ज्ञान अर्जित कर भारत की आर्थिक नींव को विश्व में सर्वश्रेष्ठ बनाने का सपना तैर रहा है। उनका कहना है, “मेरा लक्ष्य सिर्फ बैलेंस शीट मिलाना नहीं, बल्कि भारत की बैलेंस शीट को दुनिया में सबसे सशक्त बनाना है।”


समाज को संदेश: बेटियों को दीजिए आकाश, वो खुद बना लेंगी अपना इतिहास 

दृष्टि की इस उपलब्धि से सिद्धगिरी बाग से लेकर समूचे  सिंधी समाज में उल्लास की लहर है। घर पर बधाई देने वालों का तांता लगा है। समाज के बुजुर्गों की आंखें नम हैं और जुबां पर एक ही बात है: दृष्टि जैसी बेटियां कुलदीपक ही नहीं, राष्ट्र का अभिमान हैं। अवसर मिले तो बेटियां हर क्षेत्र में परचम लहरा सकती हैं। यह सफलता उन सभी माता-पिता के लिए संदेश है जो आज भी बेटियों की शिक्षा से हिचकते हैं।

राष्ट्र के नाम एक प्रण, युवाओं के नाम एक पैगाम 

अपनी सफलता पर दृष्टि भावुक होकर कहती हैं, *“यह जीत मेरी अकेली नहीं है। यह हर उस बेटी की जीत है जिसे कहा गया ‘तुमसे नहीं होगा’। मैं देश के हर युवा से कहना चाहती हूं — मंजिलें इंतजार करती हैं, बस कदमों में ईमानदारी और दिल में देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा चाहिए।”


काशी की यह होनहार बेटी आज सिर्फ चार्टर्ड अकाउंटेंट नहीं बनी, एक आंदोलन बन गई है — बेटी शिक्षा का, आर्थिक आत्मनिर्भरता का और राष्ट्रनिर्माण का। सीए दृष्टि प्रद्धवानी की विजयगाथा साबित करती है कि जब बेटियां पढ़ेंगी और बढ़ेंगी, तभी भारत वास्तव में विश्वगुरु बनेगा।

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