सिगरा पुलिस का डर्टी गेम: 5 महीने तक बुजुर्ग दंपती को गुमराह कर, गुपचुप तरीके से मुजरिम को भेजा जेल!
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| पीड़ित दंपति |
वाराणसी। क्या वाराणसी पुलिस कमिश्नरेट बनने के बाद भी आम जनता महफूज है? क्या अपराध घटित होने के बाद पुलिस माल बरामदगी में भी 'अपना हिस्सा' तय करने लगी है? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि सिगरा थाना अंतर्गत नगर निगम चौकी पुलिस का एक ऐसा कारनामा सामने आया है, जिसने खाकी की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।
लाखों की छिनैती के मामले में पुलिस ने न सिर्फ 5 महीने तक पीड़ित परिवार और पत्रकारों को झूठे आश्वासनों से गुमराह किया, बल्कि एक आरोपी को चोरी-छिपे जेल भी भेज दिया। पीड़ित को अब तक यह नहीं पता कि असली मुजरिम कौन है और उनके जीवन भर की गाढ़ी कमाई कहां गई?
पुलिस के 'खेले' की क्रोनोलॉजी
पुलिस कमिश्नर कराएं जांच: क्या सेवानिवृत्त अभियंता को सड़क पर बदमाशों ने और थाने में पुलिस ने लूटा?
5 महीने का धोखा: परिजनों को गुमराह कर, 'जल्द गिरफ्तारी' का झूठा आश्वासन देती रही पुलिस।
रिकवरी के नाम पर मजाक: लाखों की छिनैती में से मुजरिम के पास से मात्र ₹2800 की बरामदगी दिखाई गई
क्या है पूरा मामला?
यह घटना पांच माह पूर्व की है। सिंचाई विभाग के सेवानिवृत्त अभियंता राजकुमार सिंह (71 वर्ष) और उनकी पत्नी श्रीमती गीता सिंह (67 वर्ष) रात लगभग 12 बजे अपने गांव से कैंट स्टेशन पहुंचे थे। वहां से ऑटो रिक्शा लेकर वे अपने आवास (राजेंद्र विहार कॉलोनी, नेवादा, सुंदरपुर) जा रहे थे।तभी नगर निगम चौकी अंतर्गत लहरतारा-सनबीम मोड़ पर बाइक सवार बदमाशों ने झपट्टा मारकर बुजुर्ग पत्नी के हाथ से बैग छीन लिया।लूटे गए माल और पुलिस की बरामदगी का शर्मनाक सच:विवरणलूटा गया सामान पीड़ित का दावा गायब नगदी₹35,000 नकद मात्र ₹2,800गैजेट्स2 एंड्रॉयड स्मार्टफोन गायबअन्यघर की चाबियां, चश्मा सोने की चैन मूल्य लगभग लाखो मे आदि गायब
गुमराह करने में माहिर पुलिस अधिकारी
1. नगर निगम चौकी इंचार्ज का 'फिल्मी' अंदाज: पंद्रह दिन बाद जब पत्रकारों ने चौकी प्रभारी से जानकारी मांगी, तो उन्होंने फिल्मी डायलॉग मारते हुए कहा कि "बाइक पहचान में आ गई है, मुजरिम जल्द पकड़े जाएंगे।" अपना फोन शायद ही कभी उठाने वाले इस चौकी इंचार्ज ने 5 महीने तक लगातार पीड़ित परिवार और मीडिया से झूठ बोला ताकि समय बीत जाए और मामला ठंडे बस्ते में चला जाए।
पूर्व थाना प्रभारी का 'सर्विलांस' वाला झूठ:
सिगरा के पूर्व थाना प्रभारी संजय मिश्रा ने भी मामले में झूठ का सहारा लिया। उन्होंने परिजनों को तसल्ली दी कि "अपराधियों की तलाश जारी है, फोन सर्विलांस पर हैं, जल्द खुलासा होगा।"
जब फूटा पाप का घड़ा: चोरी-छिपे मुजरिम गया जेल
सच आखिर छुपता नहीं। 5 महीने बाद पीड़ित परिवार को अचानक भनक लगती है कि उक्त मुकदमे में एक अभियुक्त को महीने भर पहले ही गुपचुप तरीके से गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है! और उसके पास से महज ₹2800 बरामद दिखाए गए हैं।
इस खुलासे के बाद नगर निगम चौकी प्रभारी की भूमिका पूरी तरह संदेह के घेरे में आ गई है।
"खेल इस स्तर का है कि अब भगवान ही मालिक है कि जो अपराधी जेल गया है, वह वास्तव में अपराध में शामिल था या पुलिस ने अपनी नाकामी छुपाने और माल हजम करने के लिए किसी 'डमी मुजरिम' को जेल भेज दिया है?"
'अचूक रणनीति' के पुलिस कमिश्नर से 5 सीधे सवाल:
गुपचुप जेल क्यों? घटना में शामिल मुजरिम को चोरी-छिपे जेल क्यों भेजा गया? मीडिया और पीड़ित से यह जानकारी क्यों छुपाई गई?
शिनाख्त क्यों नहीं? पीड़ितों को बुलाकर मुजरिम की पहचान (Identification) क्यों नहीं कराई गई?
लाखों का माल कहां है? छीनी गई 20 ग्राम सोने की चेन, ₹35,000 नकद और दो मोबाइल हवा में कैसे गायब हो गए?
क्या लूट में भी लूट मची? बरामदगी के नाम पर मात्र ₹2800 दिखाना क्या इस बात का प्रमाण नहीं है कि दाल में बहुत कुछ काला है?
झूठ बोलने वाले अफसरों पर कार्रवाई कब? 5 महीने तक मीडिया और पीड़ित को गुमराह करने वाले चौकी इंचार्ज और पूर्व थाना प्रभारी पर क्या विभागीय कार्रवाई होगी?
अचूक रणनीति की मांग:
वाराणसी पुलिस कमिश्नर इस पूरे प्रकरण की तत्काल निष्पक्ष जांच कराएं, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि 71 वर्षीय बुजुर्ग सेवानिवृत्त अभियंता इस सिस्टम के हाथों दो बार तो नहीं लुट गए! पुलिस की इस कार्यप्रणाली से न सिर्फ खाकी की छवि धूमिल हो रही है, बल्कि कमिश्नरेट प्रणाली पर भी जनता का विश्वास टूट रहा है।
