कबाड़ी का कारोबार... खेल करोड़ों का !

 राजातालाब में कई बीघे में फैला है गुप्ता का कारोबार, रोजाना लाखों के माल की खरीद-बिक्री का दावा


पंकज पांडेय

वाराणसी। राजातालाब के भिखारीपुर में कबाड़ का कारोबार कई बीघे में फैला बताया जा रहा है। हाईवे से गुजरते ट्रकों से माल उतरने के दावे हैं, रोजाना लाखों रुपये के माल की खरीद-बिक्री की चर्चा है और पुरानी गाड़ियों के कटान से लेकर चोरी की गाड़ियों तक के कटान की बातें सामने आ रही हैं। यानी यहां सवाल सिर्फ कबाड़ का नहीं, बल्कि उस कबाड़ के पीछे चल रहे कथित बड़े खेल का है। अब जांच हुई तो पता चलेगा कि यह कारोबार कितना वैध है और कबाड़ के ढेर के नीचे कितने राज दबे हैं।


दूसरे प्रदेशों से आने वाले ट्रकों से माल उतरने का दावा

सूत्रों के अनुसार अशोक गुप्ता नामक व्यक्ति राजातालाब के भिखारीपुर इलाके में कबाड़ का कारोबार करता है। पड़ताल के दौरान सामने आया कि कई बीघे में फैले इस कारोबार में रोजाना लाखों रुपये के माल की खरीद-बिक्री होने की बात कही जा रही है। सूत्रों के मुताबिक कारोबारी की औसत कमाई भी प्रतिदिन करीब एक लाख रुपये तक बताई जाती है।

बताया जा रहा है कि इस कारोबार का एक सिरा उन ट्रक चालकों से जुड़ा है, जो दूसरे प्रदेशों से बंगाल समेत अन्य प्रदेशों की स्टील फैक्ट्रियों के लिए कबाड़ लेकर जाते हैं। इन फैक्ट्रियों में कबाड़ को गलाकर सरिया और दूसरे लौह उत्पाद तैयार किए जाते हैं।

बताया जाता है कि रास्ते में कुछ ट्रक चालकों की कबाड़ कारोबारियों से ऐसी ‘सेटिंग’ है कि वह चोरी-छिपे राजातालाब के भिखारीपुर में करीब चार से पांच कुंतल माल उतार देते हैं। इसी तरह सरिया और गाटर लेकर दूसरे इलाकों की ओर जाने वाले वाहनों से भी चार-पांच कुंतल माल यहां उतारे जाने की बात सामने आ रही है।

यानी जिस माल को अपने निर्धारित गंतव्य तक पहुंचना चाहिए, रास्ते में ही उसका कुछ हिस्सा ‘कबाड़’ के नाम पर उतर जाता है। अगर यह दावे सही पाए जाते हैं तो ट्रक चालक से लेकर कबाड़ कारोबारी तक इस कथित खेल में अपनी-अपनी हिस्सेदारी तलाशते नजर आएंगे।


पुरानी गाड़ियों के कटान से लेकर चोरी की गाड़ियों तक चर्चा

मगर कहानी सिर्फ ट्रकों से उतरने वाले माल तक सीमित नहीं बताई जा रही है।

सूत्रों का दावा है कि राजातालाब के इस इलाके में पुरानी कबाड़ गाड़ियों की खरीद-फरोख्त और कटान के साथ चोरी की नई गाड़ियों को काटे जाने की भी चर्चा है।

अगर यह दावा सही है तो मामला महज कबाड़ खरीदने और बेचने का नहीं रह जाता, बल्कि यह किसी संगठित नेटवर्क की ओर इशारा कर सकता है। ऐसे में पुलिस और परिवहन विभाग के लिए पूरे कारोबार की जांच जरूरी हो जाती है।

जांच का विषय यह भी है कि यहां कटान के लिए आने वाले वाहनों के दस्तावेजों की जांच किस स्तर पर होती है। वाहनों के चेसिस और इंजन नंबरों का रिकॉर्ड किस तरह रखा जाता है और कटान के बाद इन नंबरों से जुड़े दस्तावेजों का क्या होता है।


रोजाना लाखों के कारोबार का हिसाब कौन रखता है-

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि कई बीघे में फैले इस कारोबार में रोजाना लाखों रुपये का माल आखिर कहां से आ रहा है। ट्रकों से उतरने वाला चार-पांच कुंतल माल किस हिसाब-किताब में दर्ज होता है। खरीद-बिक्री के बिल क्या हैं और मौके पर मौजूद स्टॉक का रिकॉर्ड किस तरह रखा जाता है।


अगर चोरी की गाड़ियों के कटान की चर्चा महज अफवाह नहीं है तो उन वाहनों के चेसिस और इंजन नंबरों का क्या होता है। क्या उनका रिकॉर्ड संबंधित विभागों को उपलब्ध कराया जाता है। क्या वाहन मालिकाना हक और दस्तावेजों की जांच के बाद ही गाड़ियों का कटान किया जाता है।

कबाड़ का कारोबार करना अपने आप में कोई अपराध नहीं है, लेकिन कबाड़ के नाम पर अगर किसी दूसरे स्रोत का माल, चोरी के वाहन या संदिग्ध तरीके से हासिल सामान खपाया जा रहा है तो मामला गंभीर हो जाता है।


कबाड़ का यह कारोबार कितना ‘कबाड़’ है और कितना बड़ा खेल, यह जांच के बाद ही साफ होगा। अब देखना यह है कि पुलिस, परिवहन विभाग और संबंधित अन्य विभाग हाईवे किनारे कई बीघे में फैले इस कारोबार की पड़ताल करते हैं या फिर कबाड़ के ढेर के पीछे छिपे सवाल यूं ही दबे रह जाते हैं।

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