एक शाम महाकाल के नाम’ में गूंजे शिव आराधना के स्वर, हरिश्चन्द्र घाट पर आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर हुआ वातावरण

 अघोर चतुर्दशी पर अघोरपीठ हरिश्चन्द्र घाट में भव्य धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन, हजारों श्रद्धालुओं ने की सहभागिता









वाराणसी। काशी के पावन हरिश्चन्द्र घाट स्थित अघोरपीठ हरिश्चन्द्र घाट काशी में अघोर चतुर्दशी के पावन अवसर पर आयोजित भव्य धार्मिक एवं सांस्कृतिक समारोह श्रद्धा, साधना, अध्यात्म और सनातन संस्कृति के अद्भुत संगम के रूप में संपन्न हुआ। पीठाधीश्वर कपाली बाबा के सानिध्य में आयोजित समारोह में काशी सहित आसपास के जिलों से पहुंचे हजारों श्रद्धालुओं एवं गणमान्य लोगों ने सहभागिता की।

समारोह का प्रमुख आकर्षण भव्य सांस्कृतिक संध्या ‘एक शाम महाकाल के नाम’ रही। गंगा तट पर स्थित हरिश्चन्द्र घाट की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि में जैसे ही शिव आराधना, भजन और भक्ति संगीत के स्वर गूंजे, पूरा वातावरण शिवमय हो उठा। श्रद्धालु देर रात तक भक्ति में लीन रहे और कलाकारों की प्रस्तुतियों ने उपस्थित जनसमूह को भावविभोर कर दिया।

अघोर चतुर्दशी के अवसर पर अघोरपीठ में विधि-विधान के साथ विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए। संतों और श्रद्धालुओं ने भगवान शिव का स्मरण करते हुए लोककल्याण, मानव सेवा, आध्यात्मिक चेतना और सामाजिक समरसता की कामना की।

ढाई दशक से अधिक समय से अघोर परंपरा और सनातन संस्कृति के लिए समर्पित आयोजन

कार्यक्रम के दौरान शिवसेना मंडल प्रमुख अजय चौबे ने बताया कि पीठाधीश्वर कपाली बाबा के सानिध्य में यह धार्मिक एवं आध्यात्मिक परंपरा ढाई दशक से भी अधिक समय से निरंतर आगे बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि इन आयोजनों का उद्देश्य सनातन संस्कृति को बढ़ावा देना, अघोर पंथ की आध्यात्मिक परंपरा को समाज के सामने रखना तथा लोगों को अघोर दर्शन के मूल भाव को समझने का अवसर प्रदान करना है।

अजय चौबे ने कहा कि अघोर परंपरा को केवल बाहरी रूप या रहस्य के आधार पर नहीं समझा जा सकता। इसके मूल में मानवता, सेवा, करुणा, समभाव और आत्मचिंतन की भावना निहित है। ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं से जोड़ने का भी महत्वपूर्ण माध्यम हैं।


*कपाली बाबा ने दिया मानवता और समभाव का संदेश*

पीठाधीश्वर कपाली बाबा ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि अघोर परंपरा का मूल भाव मानवता, करुणा, सेवा और समभाव में निहित है। अघोर चतुर्दशी साधना, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक जागरण का पर्व है, जो मनुष्य को बाहरी आडंबरों से ऊपर उठकर अपने भीतर की चेतना को पहचानने का संदेश देता है।

उन्होंने कहा कि ‘एक शाम महाकाल के नाम’ भगवान शिव के चरणों में भक्ति अर्पित करने के साथ-साथ काशी की सनातन आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास है। भगवान महाकाल की आराधना मनुष्य के भीतर सकारात्मक ऊर्जा, आत्मबल और लोककल्याण की भावना को मजबूत करती है।

*भक्ति संगीत और शिव स्तुति से गूंजा हरिश्चन्द्र घाट*


सांस्कृतिक संध्या में कलाकारों ने भजन, शिव स्तुति एवं आध्यात्मिक प्रस्तुतियों से ऐसा समां बांधा कि श्रद्धालु देर तक भक्ति में डूबे रहे। गंगा की धारा, हरिश्चन्द्र घाट का आध्यात्मिक वातावरण और शिव आराधना के स्वर पूरे आयोजन को विशेष आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान कर रहे थे।


कार्यक्रम के दौरान लगातार ‘हर-हर महादेव’ और ‘बाबा की जय-जयकार’ से पूरा परिसर गूंजता रहा। श्रद्धालुओं ने भगवान महाकाल की आराधना करते हुए आयोजन की सफलता के लिए आभार व्यक्त किया।



*जनप्रतिनिधियों और गणमान्य लोगों ने की सहभागिता*

समारोह में पंकज सिंह डब्लू, कैंट विधायक सौरभ श्रीवास्तव, मंत्री दयाशंकर मिश्र ‘दयालु’ सहित काशी एवं आसपास के जिलों से बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक, संत, सामाजिक कार्यकर्ता एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे। हजारों लोगों की सहभागिता ने आयोजन को भव्य स्वरूप प्रदान किया।

आयोजकों ने कहा कि हरिश्चन्द्र घाट की धरती पर आयोजित यह समारोह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि काशी की सनातन चेतना, आध्यात्मिक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का उत्सव है। अघोरपीठ की ओर से लंबे समय से चली आ रही यह परंपरा श्रद्धा और साधना के साथ समाज में सेवा, समरसता और मानवता का संदेश भी देती रही है।

समारोह के समापन पर अघोरपीठ हरिश्चन्द्र घाट काशी की ओर से आयोजन में सहयोग करने वाले संतों, श्रद्धालुओं, कलाकारों, अतिथियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं सभी सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया गया।

हरिश्चन्द्र घाट पर अघोर चतुर्दशी के अवसर पर आयोजित ‘एक शाम महाकाल के नाम’ की शिवमय गूंज देर तक काशी के आध्यात्मिक वातावरण में महसूस होती रही और श्रद्धालुओं के मन में भक्ति एवं आध्यात्मिक अनुभूति की अमिट छाप छोड़ गई।

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