वाराणसी। ग्रामीण परिवेश के एक साधारण विद्यालय से शिक्षा की शुरुआत कर बीएचयू के
रसायन विज्ञान विभाग के प्रोफेसर बनने तक प्रो. दया शंकर पांडेय की यात्रा संघर्ष, मेहनत और सफलता की प्रेरणादायी कहानी है।
उन्होंने के.एस. साकेत पीजी कॉलेज, अयोध्या से बीएससी और एमएससी की शिक्षा प्राप्त की तथा यूजीसी-नेट एवं जेआरएफ उत्तीर्ण करने के बाद वर्ष 1983 में आईआईटी कानपुर से पीएचडी की। उनका शोध एरीन-रूथेनियम कॉम्प्लेक्स तथा उनके संभावित कैंसररोधी उपयोग पर केंद्रित रहा। इसके बाद उन्होंने अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा में अध्यापन शुरू किया और आगे चलकर बीएचयू में प्रोफेसर के रूप में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
रसायन विज्ञान के क्षेत्र में उनके शोध में ऑर्गेनोमेटैलिक रसायन, मेटल कॉम्प्लेक्स, उत्प्रेरण तथा BODIPY कॉम्प्लेक्स जैसे विषय प्रमुख रहे हैं। उन्हें जे.सी. बोस फेलोशिप, JSPS, अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट और मैरी क्यूरी फेलोशिप सहित कई प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए हैं। वर्ष 2018 से 2021 तक वे बीएचयू के रसायन विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष भी रहे।
उनकी अकादमिक यात्रा में प्रो. के.एन. सिंह (विभागाध्यक्ष, रसायन विज्ञान विभाग, बीएचयू), प्रो. संजय कुमार सिंह, प्रो. मृगेन्द्र दुबे (आईआईटी इंदौर), डॉ. ओम सिंह सिसोदिया, डॉ. धर्मेंद्र गुप्ता, डॉ. संतोष दुबे, डॉ. आशीष कुमार, डॉ. रूप शिखा सिंह और डॉ. श्रुति त्रिवेदी (बीएचयू) जैसे शिक्षकों, वैज्ञानिकों और शोध सहयोगियों का भी महत्वपूर्ण जुड़ाव रहा है।
प्रो. पांडेय की कहानी गांव और छोटे शहरों के विद्यार्थियों के लिए संदेश है कि सीमित संसाधन सफलता की राह में बाधा नहीं होते। मेहनत, शिक्षा और दृढ़ संकल्प के बल पर गांव की कक्षा से देश के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्थानों तक पहुंचा जा सकता है।
