सूदखोरी के जाल में फंसा परिवार, पुलिस जांच पर उठे सवाल

 31 लाख के बदले 2.44 करोड़ वसूली का आरोप, मकान कब्जाने और जान से मारने की धमकियों से दहला परिवार 


सूदखोरी के जाल में फंसा परिवार, पुलिस जांच पर उठे सवाल

31 लाख के बदले 2.44 करोड़ वसूली का आरोप, मकान कब्जाने और जान से मारने की धमकियों से दहला वाराणसी

वाराणसी में कथित सूदखोरी, करोड़ों की अवैध वसूली, मकान कब्जाने की कोशिश और पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला सामने आया है। भेलूपुर थाना क्षेत्र में दर्ज एफआईआर ने न सिर्फ एक परिवार की पीड़ा उजागर की है, बल्कि यह भी सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर इतने लंबे समय तक कथित “सूदखोरी सिंडिकेट” कैसे सक्रिय रहा और स्थानीय पुलिस की भूमिका क्या रही?


शिकायतकर्ता महिला पूर्णा भट्टाचार्य ने आरोप लगाया है कि वर्ष 2019 में आर्थिक संकट के दौरान उनके पति देवजीत भट्टाचार्य ने निजी स्तर पर करीब 31 लाख रुपये उधार लिए थे। लेकिन बाद में यह लेन-देन कथित तौर पर सूदखोरी, धमकी और दबाव के ऐसे जाल में बदल गया, जिसमें परिवार से मूल रकम से कई गुना अधिक धन वसूला गया।


एफआईआर के अनुसार, आरोपियों ने दबाव बनाकर अब तक करीब 2 करोड़ 44 लाख रुपये तक की रकम वसूल ली, लेकिन इसके बावजूद 35 लाख रुपये और मांगे जाते रहे। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि पैसे न देने पर पूरे परिवार को अगवा करने, फर्जी मुकदमों में फंसाने और मकान पर कब्जा करने की धमकियां दी गईं।

पीड़ित पक्ष का दावा है कि दबाव बनाकर कई चेकों और स्टाम्प पेपरों पर हस्ताक्षर भी कराए गए। इतना ही नहीं, परिवार की गतिविधियों पर नजर रखने और घर की निगरानी कराने तक के आरोप लगाए गए हैं। महिला का कहना है कि परिवार लंबे समय से भय और मानसिक दबाव के माहौल में जी रहा है।



एफआईआर में 11 जून 2025 की घटना का भी उल्लेख किया गया है। शिकायत के मुताबिक, सुबह कुछ लोग घर पहुंचे, गाली-गलौज की, महिला से अभद्रता की और कथित तौर पर पिस्टल दिखाकर जान से मारने की धमकी दी। आरोप है कि रकम न देने पर पूरे परिवार को खत्म करने की चेतावनी दी गई।

मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 308(3), 74, 352, 351(2) समेत उत्तर प्रदेश साहूकारी अधिनियम की धाराएं लगाई गई हैं। कानूनी जानकारों के अनुसार, बिना वैध लाइसेंस सूद पर पैसा चलाना गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है और ऐसे मामलों में बैंक ट्रांजैक्शन, संपत्ति दस्तावेज, कॉल डिटेल और वित्तीय रिकॉर्ड की गहन जांच जरूरी होती है।

अब इस पूरे मामले में पुलिस की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। पीड़ित परिवार का आरोप है कि लंबे समय तक शिकायतों के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई, जिससे आरोपियों के हौसले बढ़ते गए। सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि कथित तौर पर करोड़ों की वसूली और धमकियों का सिलसिला वर्षों से चल रहा था, तो स्थानीय पुलिस को इसकी जानकारी क्यों नहीं हुई? और यदि जानकारी थी, तो कार्रवाई में देरी क्यों हुई?

फिलहाल मामले की जांच उपनिरीक्षक घनश्याम मिश्रा को सौंपी गई है। वहीं पीड़ित परिवार निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की मांग कर रहा है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि यह मामला केवल एफआईआर तक सीमित रहेगा या फिर कथित सूदखोरी नेटवर्क और पुलिस कार्रवाई की परतें भी खुलेंगी।

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