"बनारस की वो गलियाँ जो आपको खुद से मिलाती हैं! 🔱 अखाड़े, घाट और मोक्ष की इस कहानी को एक बार जरूर पढ़ें।"

           हर-हर महादेव

काशी की गलियों और गंगा की लहरों में बसा यह शहर मात्र एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि एक जीवंत अहसास है। चलिए, स्वागत है आपका   जाने काशी-बनारस के दूसरे भाग में

पिछला अंक आपने नही पढ़ा तो क्लिक करें 👉Part 1 


                     काशी की परंपरा: घाट, 

काशी का हृदय उसके घाटों में धड़कता है। यहाँ सुबह की शुरुआत सूर्य अर्घ्य से होती है और रात का अंत गंगा की भव्य आरती से।काशी के घाट केवल पत्थर की सीढ़ियाँ नहीं हैं, बल्कि ये इस शहर की आत्मा और इतिहास के जीवंत दस्तावेज हैं। गंगा के किनारे अर्धचंद्राकार रूप में बसे ये 84 घाट आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

घाटों के महत्व :काशी को 'मोक्षदायिनी' कहा जाता है, और इसके घाटों का इस विश्वास में सबसे बड़ा योगदान है।पंचतीर्थ घाट: अस्सी, दशाश्वमेध, मणिकर्णिका, पंचगंगा और आदि केशव घाटों को 'पंचतीर्थ' माना जाता है। मान्यता है कि इनके दर्शन मात्र से जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिल जाती है।अंतिम संस्कार: मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट को 'महाश्मशान' कहा जाता है। यहाँ 24 घंटे चिता की अग्नि जलती रहती है, जो जीवन की नश्वरता और मृत्यु के बाद की शांति का प्रतीक है।

घाट सदियों से संगीत, नृत्य और कला के केंद्र रहे हैं।

सुबह-ए-बनारस: अस्सी घाट पर सूर्योदय के समय होने वाला मंत्रोच्चार, योग और शास्त्रीय गायन काशी की सुबह को दिव्य बनाता है।गंगा आरती: दशाश्वमेध घाट की भव्य आरती विश्व प्रसिद्ध है। यह मनुष्य की प्रकृति (गंगा) के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा को प्रदर्शित करने का सबसे सुंदर तरीका है।


          घाटों पर खड़े ऊँचे-ऊँचे महल और मंदिर 

अधिकांश घाटों और महलों का निर्माण 18वीं और 19वीं शताब्दी में मराठा राजाओं (जैसे होलकर, सिंधिया, भोंसले) और राजस्थान के राजाओं द्वारा कराया गया था।अद्वितीय बनावट: पत्थरों पर की गई नक्काशी और घाटों की ढाल इस तरह बनाई गई है कि भीषण बाढ़ के समय भी ये अडिग खड़े रहते हैं।हर घाट का नाम किसी न किसी पौराणिक घटना या व्यक्तित्व से जुड़ा है।दशाश्वमेध घाट: माना जाता है कि यहाँ भगवान ब्रह्मा ने दस अश्वमेध यज्ञ किए थे।तुलसी घाट: यहाँ गोस्वामी तुलसीदास जी ने 'रामचरितमानस' के कुछ अंश लिखे और प्रसिद्ध 'हनुमान चालीसा' की रचना की।

अस्सी घाट से शुरू होकर वरुणा संगम तक फैले 84 घाटों की अपनी कहानी है। जहाँ दशाश्वमेध घाट अपनी रौनक के लिए जाना जाता है, वहीं मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट जीवन की अंतिम सत्यता (मोक्ष) का बोध कराते हैं।

काशी के प्रमुख घाट

अस्सी घाट: सुबह-ए-बनारस और शांति के लिए प्रसिद्ध

दशाश्वमेध घाट: विश्व प्रसिद्ध गंगा आरती के लिए

मणिकर्णिका घाट: जीवन के अंतिम सत्य और मोक्ष का द्वार

हरिश्चंद्र घाट: प्राचीन श्मशान घाट और पौराणिक महत्व

चेत सिंह घाट: ऐतिहासिक किला और स्थापत्य कला

दरभंगा घाट: भव्य महलों जैसी वास्तुकला

तुलसी घाट: गोस्वामी तुलसीदास जी की कर्मस्थली

पंचगंगा घाट: पाँच नदियों का अदृश्य संगम

नारद घाट: भक्ति और शांति का केंद्र

सिंधिया घाट: टेढ़ा शिव मंदिर और रहस्यमयी बनावट

             काशी की परंपरा:  अखाड़े

काशी की अखाड़ा संस्कृति केवल शरीर बनाने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह अध्यात्म, अनुशासन और राष्ट्र रक्षा की सदियों पुरानी परंपरा का संगम है। यहाँ की मिट्टी में त्याग और तपस्या की गूँज सुनाई देती है।

अखाड़ों का इतिहास और उद्देश्य
अखाड़ा शब्द का अर्थ है 'अभ्यास स्थल' या 'मल्ल युद्ध का स्थान'। इसकी स्थापना आदि गुरु शंकराचार्य ने धर्म की रक्षा के लिए 'नागा साधुओं' के सैन्य संगठन के रूप में की थी। समय के साथ, ये केंद्र कुश्ती और शारीरिक बल के साथ-साथ मानसिक शक्ति के विकास के स्थान बन गए।

एक पहलवान की दिनचर्या ब्रह्म मुहूर्त (तड़के 4 बजे) से शुरू होती है।अखाड़े की मिट्टी को हनुमान जी का प्रतीक माना जाता है। कसरत शुरू करने से पहले मिट्टी को माथे पर लगाया जाता है।इसमें पारंपरिक तरीके जैसे डंड-बैठक, नाल उठाना, गदा घुमाना और हनुमान जंजीर का अभ्यास शामिल है।कसरत के बाद सरसों के तेल या विशेष जड़ी-बूटियों वाले तेल से मालिश की जाती है, जो मांसपेशियों को लचीला बनाती है।अखाड़े का जीवन पूर्णतः सात्विक होता है। यहाँ 'नशा' वर्जित है।पहलवानों के आहार में दूध, घी, बादाम, अंकुरित अनाज और चने की प्रमुखता होती है। बादाम रगड़ा (बादाम को सिल-बट्टे पर घिसकर बनाया गया पेय) यहाँ का ऊर्जा स्रोत है।इंद्रिय संयम और ब्रह्मचर्य का पालन अखाड़ा संस्कृति की रीढ़ है।अखाड़ों में आज भी प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा जीवित है। गुरु केवल कुश्ती के दांव-पेंच ही नहीं सिखाते, बल्कि जीवन के नैतिक मूल्यों और मर्यादा का पाठ भी पढ़ाते हैं। शिष्यों के लिए गुरु की आज्ञा सर्वोपरि होती है।

                काशी की परंपरा: रीती रिवाज़ 

काशी (वाराणसी) में 'जीवन चक्र' का अर्थ केवल जन्म से मृत्यु तक का सफर नहीं है, बल्कि यह आत्मा की अनंत यात्रा का एक पड़ाव माना जाता है। यहाँ के रीति-रिवाज इस तरह रचे गए हैं कि वे मनुष्य को संसार से जोड़ते भी हैं और अंत में उसे मुक्त भी करते हैं।

काशी में बच्चे का जन्म केवल एक परिवार की खुशी नहीं, बल्कि महादेव के आशीर्वाद के रूप में देखा जाता है।
जन्म के बाद शिशु और माता के कल्याण के लिए गंगा जल का छिड़काव और पूजन किया जाता है।
 यहाँ के लोग अपने बच्चों का मुंडन अक्सर विंध्याचल या काशी के प्रमुख घाटों पर करना शुभ मानते हैं, ताकि बच्चा बचपन से ही पवित्र मिट्टी और संस्कारों से जुड़ा रहे।काशी को 'विद्या की राजधानी' (सर्वविद्या की राजधानी) कहा जाता है। यहाँ जनेऊ संस्कार का बहुत महत्व है। बटुक (बालक) को काशी की गलियों में भिक्षा मांगते हुए 'काशी यात्रा' का स्वांग करना पड़ता है, जो यह दर्शाता है कि वह ज्ञान की खोज में घर छोड़ रहा है।आज भी कई परिवारों में बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ पारंपरिक वैदिक मंत्रोच्चार सिखाया जाता है।काशी के विवाहों में लोकगीतों (जैसे 'ग़ारी' और 'सोहर') का विशेष महत्व है। विवाह के बाद नवविवाहित जोड़ा सबसे पहले बाबा विश्वनाथ के दरबार में मत्था टेकने जाता है। यहाँ की शादियों में गंगा-जमुनी तहजीब और प्राचीन हिंदू रीति-रिवाजों का अद्भुत संगम दिखता है, दुनिया भर में लोग रिटायरमेंट के बाद आराम खोजते हैं, लेकिन हिंदू धर्म में लोग 'काशी वास' के लिए तड़पते हैं। काशी में ऐसे भवन हैं जहाँ लोग अपने जीवन के अंतिम दिन बिताने आते हैं। यहाँ का रिवाज है 'नाम संकीर्तन' और 'गंगा दर्शन', ताकि मन शांत रहे

मृत्यु और महाश्मशान (अंत ही आरंभ है)

काशी में मृत्यु को शोक नहीं, बल्कि एक 'उत्सव' के रूप में देखा जाता है क्योंकि यहाँ मरना 'मोक्ष' (पुनर्जन्म से मुक्ति) की गारंटी माना जाता है।मान्यता है कि मणिकर्णिका घाट पर स्वयं महादेव मृत व्यक्ति के कान में 'तारक मंत्र' फूँकते हैं। श्मशान की राख (भस्म) को अपवित्र नहीं, बल्कि शिव का श्रृंगार माना जाता है। मणिकर्णिका पर जलने वाली होली ('मसान की होली') इसका जीवंत उदाहरण है।फाल्गुनी और आश्विन मास में अपने पूर्वजों के तर्पण के लिए लोग दूर-दूर से यहाँ के घाटों पर आते हैं ताकि उनके पूर्वजों की आत्मा को शांति मिले।काशी का जीवन चक्र 'गंगा की लहरों' जैसा है—जो जहाँ से शुरू होता है, वहीं विलीन हो जाता है। यहाँ हर रीति-रिवाज मनुष्य को यह याद दिलाता है कि वह शरीर नहीं, बल्कि एक शाश्वत आत्मा है।

अगले अंक मे पढ़ेंगे
काशी की परंपरा: भजन और संगीत: बनारस घराने की शास्त्रीय विरासत और गलियों में गूँजते शिव के भजन।

स्वाद और जायका: कचौड़ी-सब्जी से लेकर विश्वप्रसिद्ध बनारसी पान और मलाईयो का जादू।

महल और स्थापत्य: गंगा किनारे खड़े वो भव्य महल जो इतिहास की गवाही देते हैं।

तो तैयार हो जाइए, मेरे साथ इस रूहानी सफर पर चलने के लिए। काशी का असली रंग अभी दिखना बाकी है! हर -हर महादेव 

📌 आपकी काशी से जुड़ी सबसे पसंदीदा याद कौन सी है? कमेंट्स में जरूर बताएं! 👇



#अचूकरणनीति #achookranniti#Kashi #Varanasi #Banaras #Spirituality #IncredibleIndia #IndianCulture #GhatsOfKashi #EternalCity #ShivShakti #TravelGram #VaranasiDiaries #IndianHeritage #CultureOfIndia #BabaVishwanath #AChookrnniti #AChook#मोक्षदायिनी, गंगा आरती, पंचक्रोशी यात्रा, जीवन-मृत्यु का चक्र, अखाड़ा। Hashtags: #KashiTradition #GangaGhats #AssiGhat #EternalKashi #CultureOfIndia मराठा वास्तुकला, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, ऐतिहासिक विरासत, पत्थर की नक्काश #KashiArchitecture #HeritageSites #GangesPalaces #IncredibleIndia #AncientCity मोक्षदायिनी, महाश्मशान, सुबह-ए-बनारस, अर्धचंद्राकार, पंचतीर्थ, गंगा आरती, स्थापत्य कला।  #GhatsOfKashi #VaranasiHeritage #SpiritualGanga #DashashwamedhGhat #ManikarnikaGhat #KashiDarshan #AncientVaranasi #IndianCulture

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने