आईपीएस सुभाष चन्द्र दुबे : एक नाम जो अपराधियों में खौफ का पर्याय !

न्यायसंगत निष्पक्ष कार्यवाही औऱ मानवीय संवेदनाओं के लिए हैं चर्चित

उत्तर प्रदेश पुलिस सेवा में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो सिर्फ पद से नहीं बल्कि अपने काम, फैसलों और कार्यशैली से पहचाने जाते हैं। आईपीएस सुभाष चन्द्र दुबे उन्हीं अफसरों में शुमार हैं जिनका नाम सुनते ही अपराधियों में भय और आम जनता में भरोसा पैदा होता है। 

2005 बैच के सुभाष चंद्र दुबे ने संघ लोक सेवा आयोग की कठिन परीक्षा पास कर भारतीय पुलिस सेवा में प्रवेश किया और शुरुआत से ही खुद को एक अनुशासित, फील्ड में सक्रिय और निर्णय लेने वाले अफसर के रूप में स्थापित किया। 

अपने सेवाकाल के दौरान उन्होंने उत्तर प्रदेश के कई संवेदनशील और अपराध प्रभावित जिलों में जिम्मेदारी संभाली। एसपी से लेकर डीआईजी (वर्तमान में आईजी) जैसे अहम पदों पर रहते हुए उन्होंने संगठित अपराध, माफिया नेटवर्क, अवैध खनन, भूमि कब्जे आजमगढ़ डीआईजी रहते हुये शराब माफिया और दबंगई के खिलाफ सख्त अभियान चलाए। 

उनकी पहचान एक ऐसे अफसर के रूप में बनी जिसने कभी नाम, रसूख या सिफारिश को कानून से ऊपर नहीं रखा। कई मौकों पर प्रभावशाली लोगों के खिलाफ की गई कार्रवाई ने उन्हें असहज भी किया, लेकिन दुबे ने दबाव में झुकने के बजाय कानून को सर्वोपरि माना।

 उनकी पुलिसिंग का असर यह रहा कि जिन इलाकों में उनकी तैनाती हुई वहां अपराधियों ने या तो सलाखों के पीछे रहें या इलाका छोड़ना बेहतर समझा, वहीं थानों में अनुशासन और जवाबदेही बढ़ी। 

सुभाष चन्द्र दुबे आम जनता से सीधे संवाद में विश्वास रखने वाले अफसर हैं और सोशल मीडिया के जरिए वे सामाजिक संदेश और प्रशासनिक अनुभव साझा करते रहे हैं। हालांकि उनकी यह सक्रियता कभी-कभी विभागीय चर्चा का विषय भी बनी, लेकिन इससे उनकी अलग पहचान और स्पष्ट सोच सामने आई। 

यही वजह है कि अपराधी वर्ग में उनका नाम खौफ के तौर पर लिया जाता है, जबकि आम नागरिक उन्हें एक निर्भीक निष्पक्ष सहज सरल और नेकदिल पुलिस अधिकारी के रूप में देखते हैं। पहचान केवल विभाग तक सीमित नहीं रही बल्कि आमजन तक है। कुल मिलाकर आईपीएस सुभाष चन्द्र दुबे उन चुनिंदा अफसरों में हैं जो वर्दी को रुतबे का नहीं बल्कि जिम्मेदारी का प्रतीक मानते हैं और जिनकी कहानी यह बताती है कि मजबूत इच्छाशक्ति और साफ नीयत के साथ सिस्टम के भीतर रहकर भी अपराध के खिलाफ प्रभावी लड़ाई लड़ी जा सकती है। सुभाष चंद्र दुबे जहां भी रहे हैं मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं को सदैव सर्वोपरी रखा। वह उन अधिकारियों में से हैं जो किसी दबाव अर्दब में काम नहीं करतें। जो सही औऱ न्यायसंगत है उसको ही किया परिणाम जो भी रहा।

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