आगामी विधानसभा चुनाव में बसपा का साथ पाने को लालायित विपक्षी दल
उन्हें आयरन लेडी कहा जाता है और यह उपमा यूं ही नहीं दी गई है, बहन कुमारी मायावती वह मजबूत इरादों वाली नेता हैं जिन्होंने बहुजन समाज को सिर्फ राजनीतिक पहचान ही नहीं दी बल्कि आत्मसम्मान, स्वाभिमान और सत्ता में भागीदारी का वास्तविक एहसास कराया। फर्श से अर्श तक का सफर केवल नारा नहीं रहा, बल्कि बहन जी के नेतृत्व में यह हकीकत बनी। दलित, पिछड़ा और वंचित समाज जिसने दशकों तक हाशिये पर रहकर राजनीति देखी, उसने बहन मायावती के नेतृत्व में सत्ता के केंद्र तक पहुंचना सीखा।
यही वजह है कि उन्हें केवल एक वर्ग की नेता कहकर सीमित करना उनके कद और योगदान दोनों के साथ अन्याय होगा। बहन मायावती के मुख्यमंत्री कार्यकाल को आज भी सर्वसमाज याद करता है, जब कानून का इकबाल बुलंद था, प्रशासन जवाबदेह था और सत्ता में बैठा व्यक्ति भी नियमों से ऊपर नहीं था। उस दौर में यह आम धारणा थी कि चाहे वह पुलिस का अधिकारी हो या पार्टी का विधायक, अगर कानून के खिलाफ गया तो कार्रवाई तय है। बहन जी ने यह करके दिखाया कि सरकार भावनाओं से नहीं, व्यवस्था और अनुशासन से चलती है। आज भले ही विधानसभा या संसद में बसपा की संख्या कम दिखती हो, मगर बसपा को कमजोर आंकना राजनीतिक भूल होगी। बसपा के पास आज भी एक ऐसा कोर वोट बैंक है जो परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होता, जो किसी लालच, दबाव या तात्कालिक हवा में बहने के बजाय अपने नेतृत्व और विचारधारा के साथ खड़ा रहता है। यही वह मजबूती है जिसने 2027 के चुनाव को लेकर तमाम दलों को असमंजस और मोह की स्थिति में ला खड़ा किया है। हर दल यह जानता है कि बसपा का समर्थन या उसका अलग रहना, दोनों ही हालात में समीकरण बदलने की ताकत रखता है। यही कारण है कि आज बसपा के इर्द-गिर्द राजनीतिक चर्चाएं तेज हैं, रणनीतिकार गुणा-भाग में लगे हैं और बहन जी के एक निर्णय पर कई दलों का भविष्य टिका हुआ माना जा रहा है। मगर बहन मायावती की राजनीति कभी जल्दबाजी की नहीं रही, उन्होंने हमेशा समय, परिस्थितियों और बहुजन समाज के हित को केंद्र में रखकर फैसले लिए हैं। बसपा के कार्यकर्ता आज भी उसी अनुशासन और निष्ठा के साथ खड़े हैं, जैसे सत्ता के दौर में खड़े रहते थे। बहन जी का एक आह्वान आज भी लाखों लोगों को सड़क से संसद तक पहुंचने की प्रेरणा देता है। यही वजह है कि 2027 का चुनाव केवल सीटों की लड़ाई नहीं है, यह राजनीतिक धैर्य, आत्मसम्मान और स्वतंत्र निर्णय की परीक्षा भी है। हाथी किस दिशा में चलेगा, किसके साथ चलेगा या अकेले चलेगा, यह तय करने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ बहन मायावती के पास है। फिलहाल बसपा का मौन ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बना हुआ है और यही मौन दूसरे दलों की मोह-माया को और गहरा कर रहा है। देखना यह होगा कि विपक्षी दल को हाथी पीठ पर बिठाती है या उनके अरमानों को कुचलते हुए आगे बढ़ जाती है।
बसपा (BSP), उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027, आयरन लेडी। बसपा कोर वोट बैंक, विपक्षी गठबंधन, बहुजन राजनीति, शासन और प्रशासन, मायावती का मौन।भावनात्मक कीवर्ड: आत्मसम्मान और स्वाभिमान, दलित-पिछड़ा वर्ग, सर्वसमाज, अनुशासित शासन।
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