एआरटीओ निलंबन महज दिखावा...होगा फिर वही खेल बस चढ़ने दीजिये चढ़ावा !

 

ओवरलोडिंग वसूली का संस्थागत खेल निलंबन, सिंडिकेट बरकरार 

ढाबों-पंपों से होती है वसूली, पैसा ऊपर तक एआरटीओ से मंत्री तक


वाराणसी ।ओवरलोड वाहनों से अवैध वसूली के मामले में तीन एआरटीओ का निलंबन हुआ है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि कुछ दिन बाद बहाली होगी और वही धंधा फिर शुरू हो जाएगा। दरअसल यह भ्रष्टाचार व्यक्तिगत नहीं, संस्थागत है। हर जिले में ओवरलोड वाहनों से एक तयशुदा रकम लेकर वाहन मालिक/चालक को एक “इंट्री कोड” दिया जाता है। प्रवर्तन दल की चेकिंग के दौरान चालक वही कोड बताता है और चालान-जुर्माने से बच जाता है।

इस टोकन/इंट्री कोड की लिस्टिंग हाईवे किनारे ढाबों और पेट्रोल पंपों पर उपलब्ध रहती है। ढाबा-पंप संचालक अपना कमीशन काटकर शेष रकम एआरटीओ के खास सिपाही तक पहुंचाते हैं। यह रकम लाखों में होती है और ऊपर तक जाती है विभागीय मंत्री और विभाग प्रमुख तक। इसी वजह से कार्रवाई दिखावटी बनकर रह जाती है।

सूत्रों के मुताबिक एक-एक ओवरलोडिंग इंट्री कोड के जरिये एआरटीओ महीने में करीब 50 लाख से 1 करोड़ रुपये तक कमा लेते हैं, जबकि सिपाही भी 2 से 10 लाख या उससे अधिक की “फिक्स आय” बनाते हैं। जिले के अन्य अधिकारी उनसे बेगारी तक लेते हैं। यह खेल वर्षों से चल रहा है और लगभग हर जिले में फैला है।

इस पूरे नेटवर्क पर दर्जनों बार खुलासे हो चुके हैं। यदि कभी आरटीओ, एआरटीओ और परिवहन विभाग के सिपाही-लिपिकों की निष्पक्ष जांच हो, तो आय से कई गुना अधिक संपत्ति सामने आएगी। बीते वर्ष एक पूर्व परिवहन आयुक्त के यहां आयोजित शादी में आरटीओ-एआरटीओ द्वारा दिए गए महंगे गिफ्ट्स ने भी इस उपकार-संस्कृति की झलक दिखाई।

स्पष्ट है कि ओवरलोडिंग इंट्री एक वृहद सिंडिकेट के रूप में संचालित हो रही है। जो इसे बाधित करने की कोशिश करता है, उसे साजिशों का शिकार भी होना पड़ सकता है। हाईवे किनारे एक और गिरोह भी सक्रिय रहता है, जिसको 'पासर' कहते हैं यह पासर गिरोह उन गाड़ियों को पास कराता है जिन गाड़ियों के मालिक किसी कारणवश इंट्री कोड नही ले पाते। यह गिरोह चार पांच की संख्या में कार वगैरह से चलता है जिसकी सत्ता हो उसका येनकेन तरीके से पदाधिकारी या किसी अनसुने नाम वाले मीडिया यूट्यूब पोर्टल या अखबार का प्रेस कार्ड रखता है। यह सब एक साथ पच्चीस पचास गाड़ियों को बॉर्डर पास कराने का ठेका लेते हैं प्रति गाड़ी दो तीन हजार यह एआरटीओ दल की लोकेशन पता करते हैं फिर रास्ता साफ होने पर एक साथ निकल जाते हैं और बॉर्डर पार कराते हैं। एआरटीओ दल का कोई सिपाही कुछ पैसों के लिए इन पासरो का मुखबिर बन जाता है पूरी लोकेशन वही बताता है। लिखने को तो बहुत कुछ है मगर इतना जान लीजिए जो इस व्यवस्था में पकड़ा जाये वो कदाचारी जो न पकड़ा जाये वो सदाचारी कहलाता है।

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