संजय यादव के संघर्ष के 25 वर्ष ,न टिकट का मोह न हार का डर !

 टिकट कटा, नौकरी गई, जमानत जब्ती की चेतावनी मिली, फिर भी 37,500 वोट पाकर सबको चौंकाया था



राधा कृष्ण उर्फ संजय यादव का ऐलान ' अखिलेश यादव को सीएम बनाना ही लक्ष्य 



 बोलें अपने लिए नहीं, अखिलेश यादव के लिए लड़ूंगा'


विक्की मध्यानी

वाराणसी। राजनीति में टिकट कटना, हार जाना आम बात है, पर हौसला न टूटना खास बात होती है। हुकूलगंज खजुरी के संजय राधा कृष्ण यादव की कहानी ऐसी ही जिद और जज्बे की मिसाल है। 25 साल से समाजवादी पार्टी से टिकट मांगते-मांगते समय बीत गया, बसपा ने ऐन वक्त पर पत्ता काट दिया, प्राइमरी स्कूल के टीचर रहे नौकरी भी चली गई। दोस्तों ने कहा- 'जमानत जब्त हो जाएगी', पर वह मैदान में डटे रहे। ओमप्रकाश राजभर की भारतीय समाज पार्टी के उस वक्त सिंबल पर लड़े और 37,500 वोट पाकर दूसरे नंबर पर रहे। जीत से सिर्फ 4500 वोट दूर। मगर अब संजय ने ऐलान किया है- 'न टिकट मांगूंगा, न दुख होगा। अब लक्ष्य सिर्फ एक है अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाना।' 

सियासत के समीकरणों में उलझकर कितने ही नेता हाशिये पर चले जाते हैं, पर कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जो हार कर भी जीत की इबारत लिख देते हैं,ऐसी ही कुछ कहानी है हुकूलगंज खजुरी निवासी संजय राधा कृष्ण यादव की कहानी भी 25 साल के ऐसे ही संघर्ष की दास्तान है, जहां टिकट कटा, नौकरी गई, ताने मिले, लेकिन हौसला नहीं टूटा।

टिकट कटा, फिर भी मैदान नहीं छोड़ा

संजय यादव बताते हैं, "2007 विधानसभा चुनाव से ठीक एक महीना पहले बसपा से टिकट फाइनल था। मैं प्रत्याशी घोषित हो चुका था। तभी समाज की सामंतवादी ताकतें सक्रिय हो गईं। दूर बैठकर निगाहें गड़ाए ताकतों ने घेराबंदी की और मेरा टिकट कटवा दिया।" 


उस वक्त संजय की नौकरी भी नहीं रही। एक तरफ रोजगार गया, दूसरी तरफ सियासी जमीन। सपा ने भी 2007 और 2012 में हाथ नहीं थामा। दोस्तों, शुभचिंतकों ने सलाह दी- 'चुनाव मत लड़ो, जमानत जब्त हो जाएगी।' 

अनजान पार्टी, 37,500 वोट और दूसरा स्थान

पर संजय ने किसी की नहीं सुनी। उन्होंने फैसला किया- "भले एक वोट खुद का पाऊं, लेकिन लडूंगा जरूर, क्योंकि मेरी सोच लड़ रही थी।" उस दौर में ओमप्रकाश राजभर की भारतीय समाज पार्टी को कोई जानता तक नहीं था। उसी के सिंबल पर संजय मैदान में कूद पड़े। 

दिन-रात क्षेत्र में घूमे, जनता के बीच गए। नतीजा आया तो सब हैरान रह गए। संजय राधा कृष्ण को 37,500 वोट मिले और वे दूसरे स्थान पर रहे। जीतने वाले उदय लाल मौर्या को 42,000 वोट मिले थे। यानी जीत का फासला सिर्फ 4,500 वोट का रहा। 

"तब लोगों ने कहा- हमसे गलती हो गई। जनता ने भी कहा कि थोड़ा और दम लगाते तो विधायक बन जाते," संजय याद करते हैं।

25 साल से सपा का दरवाजा खटखटा रहे 

संजय का दर्द यह है कि वे पिछले 25 वर्षों से समाजवादी पार्टी से टिकट मांग रहे हैं। लेकिन हर बार कभी जातीय समीकरण, कभी गठबंधन की मजबूरी में उनका नाम कट जाता है। "मैं हर बार छंट जाता हूं," वे कहते हैं।


अब नया संकल्प: टिकट नहीं, अखिलेश को सीएम बनाना लक्ष्य 

लगातार की ठोकरों के बाद अब संजय ने अपनी सियासत की दिशा बदल दी है। वे कहते हैं, "अब मैंने सोच लिया है कि न टिकट मांगूंगा और न दुख होगा। लक्ष्य अब बहुत साफ है।" 


संजय अब पूरी तरह समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ हैं। "मैं अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री के रूप में देखता हूं। पार्टी से जो भी प्रत्याशी लड़ेगा, उसे जिताने के लिए जी-जान लगा दूंगा। अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष को सीएम बनाना है तो टिकट मांगने की जरूरत नहीं। जो भी लड़ेगा, उसे चुनाव जिताने का पूरा प्रयास करूंगा।


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