साधु-संत कोई लिबास नहीं होता, वह एक विचारधारा होता है, जो भी व्यक्ति लोभ-मोह, राग-द्वेष से परे हो।
![]() |
| विनय मौर्य |
बहरहाल बात बाबा की हो रही है, उस सियासी बाबा की, जिनके लिए मेरे हृदय में आज भी सम्मान है। मगर अपने सियासी राग-द्वेष के चलते उन्होंने सिर्फ मुझ जैसे निपट अज्ञानी ही नहीं, बल्कि कई बौद्धिक और विद्वतजनों के मन में भी यह गहरा संदेह पैदा कर दिया है कि बाबा ऐसा कैसे कर सकते हैं।
पूर्व आईपीएस अमिताभ ठाकुर को सरकार के खिलाफ आवाज उठाने के मामले में साजिशन, हां कत्तई साजिशन, एक बेहद पुराने प्रकरण में जेल में ठूंस दिया गया है। उनके साथ सरकारी व्यवहार ऐसा है मानो वह कोई हार्डकोर अपराधी हों, जबकि कोई सामान्य व्यक्ति होता तो 1999 के उस मामले को अब तक न्यायालय भी खारिज कर जमानत दे चुका होता, आखिर इतने पुराने मामले में अचानक गिरफ्तारी और जेल, यह समझना किसी अदालत के लिए भी कठिन नहीं।
मगर जिसके खिलाफ सरकार खड़ी हो, उसे कौन बचा सकता है। खबरों के मुताबिक अमिताभ ठाकुर की तबियत खराब है, उन्हें हार्ट संबंधी दिक्कत है, मगर सरकार उन्हें सरकारी कालकोठरी से बाहर नहीं आने देना चाहती, क्योंकि वह व्हिसलब्लोअर हैं। वह बाहर आएंगे तो फिर सरकार को निशाना बनाएंगे, उसकी कमियां गिनाएंगे, लिहाजा अभी उनके हिस्से में प्रताड़ना ही लिखी है।
बाबाई सरकार अमिताभ ठाकुर को सलाखों के पीछे रखकर यह संदेश देना चाहती है कि देख लो, जो भी सरकार की कमियां गिनाएगा, उसका यही हश्र होगा। यकीनन अमिताभ ठाकुर सरकारी साजिश और तानाशाही के शिकार का एक जीवंत नमूना हैं। अब सोचिए, क्या एक बाबा को क्या ऐसी सोच रखना कदाचित उचित लगता है।
दूसरा मामला एक पुलिस इंस्पेक्टर का है, जिसने कभी थानेदारी के दौरान बाबा जी की किसी पैरवी को अनसुना कर अस्वीकार कर दिया था। आज एक दशक बीत जाने के बाद भी उसे प्राइम पोस्टिंग से वंचित रखा गया है। वह इंस्पेक्टर अगर जरा भी असावधान हुआ, तनिक भी लेकिन-किंतु-परंतु में कहीं नामित हो गया, तो उसकी बर्खास्तगी भी संभव हो सकती है। फिलहाल उस इंस्पेक्टर की हालत आंधी आए बैठ गंवाए जैसी है। गौरतलब है कि अमिताभ ठाकुर और वह इंस्पेक्टर दोनों ही भूमिहार हैं।
हाल के हालातों में बाबा ब्राह्मणों को भी नाराज करते आ रहे हैं। "ऊपर से केंद्रीय नेतृत्व के नंबर दो सरदार" बाबा को बेबस करने में कोई मौका नहीं छोड़ रहे।
उस नंबर दो सरदार ने ओबीसी लॉबी के विधायकों और मंत्रियों को अपने कोटे से अपने पाले में बैठा रखा है, जबकि किसी भी सरकार और दल के सियासी वजूद के लिए ओबीसी न सिर्फ जरूरत हैं बल्कि मजबूरी भी। और तो और, सियासी तौर पर बाबा को बर्बाद करने के लिए उनके आसपास घेरा बनाए बैठे ब्यूरोक्रेट्स भी हैं, जो गलत फीडबैक देकर उन्हें गड्ढे को झील और तलवार को कील दिखाते रहते हैं।
ऊपर से बाबा खुद को एक ही जाति में समेटकर अपने ऊपर ठप्पा भी लगवा रहे हैं। खैर, मैं अदना सा पत्रकार, अदनी सी बुद्धि लेकर क्या ही कहूं। बहरहाल बाबा जो कर रहे हैं, वह एक सियासी व्यक्ति के तौर पर देखा जाए तो तानाशाही है और एक संत के रूप में परखा जाए तो निस्संदेह संतत्व के विरुद्ध आचरण है। बाकी जो है सो हइये है।
-------------------
बाबा निश्चित निष्कपट हैं,मगर निष्पक्षता कायम रखने में उतने ही निष्प्रभावी हैं।
#AmitabhThakur#Whistleblower#अचूकरणनीति#VoiceAgainstPower#JusticeForAmitabh#DemocracyInDanger#FreeSpeech#RuleOfLaw#IndianPolitics#SystemVsTruth#IPS#CivilRights#PoliticalVendetta
अमिताभ ठाकुर पूर्व आईपीएस Whistleblower Amitabh Thakur newsअचूक रणनीति राजनीतिक उत्पीड़नGovernment vs Whistleblower IndiaOld case arrest controversyIPS officer jailed newsFreedom of expression IndiaPolitical misuse of law


