वाराणसी: समाज की मुख्यधारा से काटकर किसी अपराधी को जेल की चारदीवारी में इसलिए भेजा जाता है
ताकि वह अपने कृत्यों का पश्चाताप कर सके और 'काम, क्रोध, मद, लोभ' जैसी प्रवृत्तियों को त्याग कर एक नया इंसान बन सके। लेकिन क्या वाकई ऐसा हो रहा है? वाराणसी के चौकाघाट स्थित ऐतिहासिक जिला कारागार की दहलीज के भीतर की कहानी कुछ और ही बयां करती है।
कैश’ के बदले ‘ऐश’ और वसूली का काला तंत्र
अचूक रणनीति की इस विशेष रिपोर्ट में हम पर्दाफाश कर रहे हैं जेल के उस काले तंत्र का, जहाँ कैदियों की मजबूरी और परिजनों की ममता को सरेआम नीलाम किया जाता है।
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पानी में बालू और कैंटीन में 'लूट'
MRP से ऊपर वसूली: जेल के भीतर समोसा, चाय, ब्रश, मंजन और साबुन जैसे रोजमर्रा के सामानों पर जेल प्रशासन अपनी मनमानी दरें वसूलता है। ₹10 की चीज ₹20 से ₹50 में बिकती है। यह पैसा सीधा जेल प्रशासन की जेब में जाता है।
'लेखक' और 'कमान': कैदियों द्वारा चलाई जा रही समानांतर सरकार
हैरानी की बात यह है कि जेल का नियंत्रण असल में जेल कर्मचारी नहीं, बल्कि पुराने शातिर बंदी करते हैं, जिन्हें 'लेखक' (Writer) कहा जाता है।
बैरक का मुखिया: ये लेखक ही तय करते हैं कि नया बंदी किस बैरक में सोएगा और उसे क्या सुविधाएं मिलेंगी।
भंडारा' में वीआईपी कल्चर: गरीबों का श्रम, अमीरों की दावत जेल के भंडारे में आर्थिक रूप से कमजोर बंदी खाना बनाते हैं। लेकिन यहाँ भी भ्रष्टाचार का खेल जारी है:
स्पेशल मेनू: रसूखदार बंदियों के लिए भंडारे के अंदर ही पनीर, अंडा करी और खीर जैसे पकवान पकाए जाते हैं।इसके बदले एक 'साप्ताहिक शुल्क' तय होता है, जिसका हिस्सा भंडारा निरीक्षक से लेकर जेलर तक पहुँचता है।
चिकित्सा के नाम पर 'मौत का सौदा'
अगर कोई बंदी गंभीर बीमार है, तो उसके लिए जेल की दीवारें काल बन जाती हैं। जेल का अस्पताल खुद जिला अस्पताल पर निर्भर है।
ग्रार्द लगवाने का रेट: किसी बीमार बंदी को बेहतर इलाज के लिए बाहर (जिला अस्पताल या बीएचयू) भेजने के लिए 'गार्द ' लगाई जाती है। आरोप है कि यह फाइल आगे बढ़ाने के लिए जेल प्रशासन भारी-भरकम रकम वसूलता है। पैसा नहीं तो इलाज नहीं।
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आमदनी बैरक: जहाँ से शुरू होता है 'वसूली' का खेल हैरानी की बात यह है कि जेल में कदम रखते ही एक बंदी का सामना सुधार से नहीं, बल्कि 'सुविधा शुल्क' से होता है। 10 नंबर बैरक, जिसे 'आमदनी बैरक' कहा जाता है, वहां बंदी के रसूख और उसकी आर्थिक स्थिति को तौला जाता है। आरोप है कि यहाँ सिपाही और बंदी रक्षक तय करते हैं कि किसे कितनी प्रताड़ना मिलेगी और किसे कितनी रियायत।
पैसे के दम पर अस्पताल में 'ऐश-ओ-आराम' एक तरफ जहाँ गरीब बंदी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसता है, वहीं 'रसूखदार' कैदियों के लिए जेल के नियम बदल जाते हैं। जेल प्रशासन और चिकित्सा अधिकारी की मिलीभगत से अस्पताल के बेड 'सुविधा शुल्क' के बदले आवंटित कर दिए जाते हैं। प्रतिबंधित सामग्री से लेकर मनचाहा भोजन तक, सब कुछ पैसे के बल पर उपलब्ध होना जेल की व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
मुलाकाती: अपनों के लगाव का फायदा उठाता तंत्र शोषण का यह चक्र केवल जेल के अंदर तक सीमित नहीं है। जेल के बाहर खड़े परिजनों से लेकर 14 नंबर बैरक तक पहुँचने की प्रक्रिया में हर कदम पर आर्थिक दबाव बनाया जाता है। साबुन, क्रीम या खाने-पीने की छोटी-छोटी चीजों को भी अंदर पहुँचाने के लिए परिजनों की जेब ढीली कराई जाती है।
नशे का कारोबार: ₹50,000 की तनख्वाह और 'स्कॉर्पियो' का सफर जेल के अंदर गांजा और सुरती सिगरेट का अवैध कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है।
1000 गुना मुनाफा: सूत्र बताते हैं कि सिपाही और जेल प्रशासन के लोग ही गांजा तस्करी में शामिल हैं। ₹100 की नशे का सामान जेल के अंदर ₹5000 में बेची जाती है।
आलीशान जीवन: सवाल यह उठता है कि ₹50,000 प्रति माह वेतन पाने वाला सिपाही स्कॉर्पियो से कैसे चलता है? उसके पास तीन-चार मकान कहाँ से आए? पूर्व जेल अधीक्षक उमेश सिंह पर लगे गंभीर आरोप इस संगठित अपराध की पुष्टि करते हैं।
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| पूर्व मे भी अचूक रणनीति ने जेल के भ्रष्टाचार को प्रकाशित किया था |
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| तत्कालीन जेल अधीक्षक उमेश सिंह के कारनामो को उजागर करती अचूक रणनीति की यह खबर |
व्यवस्था बना रही है 'प्रोफेसर' जब एक सामान्य व्यक्ति, जो शायद किसी गलती या साजिश का शिकार होकर जेल पहुँचता है, इस भ्रष्ट तंत्र को देखता है, तो उसका विश्वास कानून से उठ जाता है। जेल का यह माहौल उसे सुधारने के बजाय एक शातिर अपराधी बनने पर मजबूर कर देता है। जिसे 'सुधार गृह' होना चाहिए था, वह भ्रष्टाचार की वजह से 'अपराध की यूनिवर्सिटी' बनता जा रहा है।
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Prisoner exploitation in India
Chowkaghat Jail Varanasi News
जेल के अंदर का भ्रष्टाचार
वाराणसी जिला कारागार की सच्चाई
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| पूर्व मे महिला डिप्टी जेलर की शिकायत की प्रकाशित खबर |




