वाराणसी (काशी)।
महाशिवरात्रि का पर्व देशभर में मनाया जाता है, लेकिन मोक्षदायिनी काशी में यह केवल एक पर्व नहीं, बल्कि एक 'महोत्सव' है। इस बार काशी की गलियां जिस नजारे की गवाह बनेंगी, वह ऐतिहासिक होगा। काशीपुराधिश्वर (बाबा विश्वनाथ) इस महाशिवरात्रि पर अपनी अर्धांगिनी माता गौरा को ब्याहने के लिए जिस अंदाज में निकलेंगे, वैसा नजारा साल के बाकी दिनों में कभी नहीं दिखता।
हाथ में सत्ता और धर्म का प्रतीक 'सेंगोल', सिर पर नवरत्नों से जड़ा छत्र और 11 प्रकार की पवित्र लकड़ियों से बना सिंहासन बाबा का यह राजसी 'दूल्हा अवतार' भक्तों को मंत्रमुग्ध करने के लिए तैयार है।
अद्भुत होगा बाबा का 'शृंगार': 11 लकड़ियों के सिंहासन का क्या है राज?
शिवांजली के संयोजक संजीव रत्न मिश्र बताते हैं कि इस बार की शिव-बारात में बाबा का प्रतीकात्मक चल स्वरूप बेहद खास होगा।
सेंगोल (धर्मदंड): बाबा विश्वनाथ राजसी ठाठ-बाट के साथ हाथों में सेंगोल धारण करेंगे।
नवरत्न छत्र: श्री काशी विश्वनाथ डमरू सेवा समिति (मोनू बाबा और पागल बाबा) द्वारा तैयार नवरत्नों से सुसज्जित छत्र बाबा की शोभा बढ़ाएगा।
जादुई सिंहासन: बाबा जिस सिंहासन पर विराजेंगे, वह साधारण नहीं है। इसे 11 अलग-अलग प्रकार की लकड़ियों (काष्ठ) से बनाया गया है। धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, ये लकड़ियां नवग्रहों का प्रतीक हैं, जो ब्रह्मांड के संतुलन को दर्शाती हैं।
साल में 4 बार निकलते हैं बाबा, पर महाशिवरात्रि का 'भ्रमण' सबसे अलग क्यों?
यही वह सवाल है जो हर श्रद्धालु के मन में होता है। परंपराओं के शहर काशी में बाबा विश्वनाथ वर्ष में चार बार अपने गर्भगृह से बाहर निकलकर नगर भ्रमण करते हैं।
सावन पूर्णिमा,अन्नकूट महोत्सव (दीपावली के बाद),रंगभरी एकादशी,महाशिवरात्रि
फर्क क्या है?
शुरुआती तीन मौकों पर बाबा 'गृहस्थ' रूप में माता गौरा और पुत्र गणेश (प्रथमेश) के साथ सपरिवार दर्शन देते हैं। लेकिन, महाशिवरात्रि ही वह एकमात्र दिन है जब बाबा 'अकेले' निकलते हैं। यह शिव के वैराग्य से गृहस्थ बनने की यात्रा है। वे दूल्हा बनकर, अकेले, अपनी दुल्हनिया (गौरा) को लेने ससुराल (महंत आवास) से निकलते हैं। इसलिए यह स्वरूप सबसे दुर्लभ और विशिष्ट माना जाता है।
नागा साधु, अड़भंगी भक्त और डमरुओं की हुंकार
बाबा की यह बारात किसी राजा की सवारी से कम नहीं होती, लेकिन इसके बराती सबसे जुदा होते हैं। इस ऐतिहासिक बारात में:
शरीर पर भस्म रमाए नागा साधु,
वैरागी और अड़भंगी भक्त,
हाथों में डमरू लिए शिवगण,
और 'हर-हर महादेव' का गगनभेदी जयघोष।
महंत वाचस्पति तिवारी बताते हैं कि यह केवल मंदिर का अनुष्ठान नहीं, बल्कि काशी का 'लोकाचार' है। इस दिन बनारस का हर नागरिक खुद को घराती या बराती मानता है। घर-घर में दीप जलते हैं और मंगल गीत गाए जाते हैं।
भक्तों का लगा तांता, दुल्हन की तरह सजी काशी
महाशिवरात्रि पर बाबा के इस अलौकिक रूप के दर्शन के लिए देश-विदेश से भक्तों का काशी पहुंचना शुरू हो गया है। महंत परिवार और पुरानी परंपराओं का निर्वाह करने वाले परिवारों ने तैयारियां पूरी कर ली हैं। अब इंतजार है तो बस उस पल का, जब काशीपुराधिश्वर अपने नवरत्न जड़ित छत्र के नीचे, सेंगोल थामे, गौरा को ब्याहने निकलेंगे।
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